राम महेंद्र राय

सुबह के 8 बज रहे थे. किचन में व्यस्त थी. तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. मन में यह सोच कर खुशी की लहर दौड़ गई कि अमरेश का फोन होगा. फिर अचानक मन ने प्रतिवाद किया. वह अभी फोन क्यों करेगा? वह तो प्रतिदिन रात के 8 बजे के बाद फोन करता है.

अमरेश मेरा पति था. दुबई में नौकरी करता था. मोबाइल पर नंबर देखा, तो झट से उठा लिया. फोन मेरी प्रिय सहेली स्वाति ने किया था. बात करने पर पता चला कि कल उस की शादी होने वाली है. शादी में उस ने हर हाल में आने के लिए कहा. शादी अचानक क्यों हो रही है, यह बात उस ने नहीं बताई. दरअसल, उस की शादी 2 महीने बाद होने वाली थी. जिस लड़के से शादी होने वाली थी, उस की दादी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गईर् थी. डाक्टर ने उसे 2-3 दिनों की मेहमान बताया था. इसीलिए घर वाले दादी की मौजूदगी में ही उस की शादी कर देना चाहते थे.

स्वाति मेरी बचपन की सहेली थी. ग्रेजुएशन तक हम दोनों ने एकसाथ पढ़ाई की थी. उस के बाद मुंबई में उसे जौब मिल गई. वह मातापिता के साथ वहीं बस गई. अब वहीं के लड़के से शादी कर रही थी. अमरेश को बताना जरूरी था कि मुंबई जा रही हूं. उसे फोन किया, नंबर नहीं लगा. रौंग नंबर बताया गया. वह आश्चर्यचकित थी. रौंग नंबर क्यों?

अमरेश ने दुबई का जो नंबर दिया था, उस पर कभी फोन नहीं किया था. फोन करती भी तो कैसे करती? उस ने फोन करने से मना जो कर रखा था.

उस ने कहा था, ‘औफिस के काम से हर समय व्यस्त रहता हूं. सो, फोन मत करना. मैं खुद तुम्हें रोज फोन करूंगा.’ वह रोज फोन करता भी था.

फोन ट्राई करतेकरते अचानक मोबाइल हाथ से छूट गया और फर्श पर गिर कर बंद हो गया. उस ने बहुत कोशिश की ठीक करने की, मगर ठीक नहीं हुआ. हर हाल में मुंबई आज ही जाना था. सो, एजेंट से टिकट की व्यवस्था कर प्लेन से बेटे सुमित के साथ चली गई.

मुंबई एयरपोर्ट से बाहर आईर् तो शाम के 6 बज गए थे. टैक्सी से सहेली के घर जा रही थी कि एक मोड़ पर लालबत्ती देख कर ड्राइवर ने टैक्सी रोक दी. उसी समय एक गाड़ी बगल में आ कर खड़ी हो गई. अचानक गाड़ी के अंदर नजर पड़ी तो चौंक गई. बगल वाली गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर अमरेश था. उस की बगल में एक युवती बैठी थी. अमरेश को आवाज देने न देने की उधेड़बुन में थी कि हरी बत्ती हो गई और वाहन गंतव्य की ओर दौड़ने लगे.

टैक्सी वाले को उक्त गाड़ी का पीछा करने के लिए कहा तो वह तैयार हो गया. लगभग 20 मिनट बाद सफेद गाड़ी एक शानदार बिल्डिंग के अहाते में दाखिल हो गई. बिल्डिंग किस की थी? अमरेश का युवती से कैसा नाता था? मुझे दुबई बता कर मुंबई में क्या कर रहा था? यह सब जानना जरूरी था.

गेट पर गार्ड था. ड्राइवर को समझाबुझा कर गार्ड से पूछताछ करने के लिए भेज दिया. गार्ड से बात कर के 10 मिनट बाद ड्राइवर आया तो बताया कि बिल्ंिडग यहां के मशहूर बिल्डर रत्नेश्वर चौधरी की है. गाड़ी से उतर कर जो युवक व युवती मकान के अंदर गए हैं, वे चौधरी साहब की बेटी सारिका और दामाद अमरेश हैं. मुझे लगा, भूचाल आ गया है. अंदर तक हिल गई. जी चाहा कि फफकफफक कर रो पड़ूं. बड़ी मुश्किल से अपनेआप को संभाला और सहेली के घर गई.

वह अमरेश को विवाह से पहले से जानती थी. जिस कालेज में पढ़ती थी, वह भी उसी में पढ़ता था. बहुत स्मार्ट और हैंडसम था. लड़कियां उस की दीवानी थीं. मगर वह उस का दीवाना था. उस की खूबसूरती पर आहें भरता था और उस के आगेपीछे घूमता रहता था.

वह उसे चांस नहीं देती थी. दरअसल, प्रेममोहब्बत के चक्कर में पड़ कर वह पढ़ाई में पीछे नहीं होना चाहती थी. उस का इरादा ग्रेजुएशन के बाद पहले अपने पैरों पर खड़ा होना था, फिर विवाह करना था. उस के मातापिता भी यही चाहते थे.

इस तरह 2 वर्ष बीत गए. उस के बाद वह महसूस करने लगी कि वह अमरेश के इश्क में गिरफ्त हो चुकी है, क्योंकि सोतेजागते वही नजर आने लगा था. 2 साल तक जिस जज्बात को इनकार करती रही थी, वह संपूर्ण चरमोत्कर्ष के साथ उस पर छा चुका था. शायद अमरेश की लगातार कोशिश और उस के अच्छे व्यवहार ने उस की जिद के पांव उखाड़ दिए थे. 2 साल में अमरेश ने उस के साथ कभी कोई आपत्तिजनक हरकत नहीं की थी.

हमेशा उस से दोस्ताना तरीके से मिलता था. अपने जज्बात का इजहार करता था. लेकिन कभी भी जवाब के लिए तकाजा नहीं करता था. कभी कालेज से दूर तनहाई में मिलने के लिए मजबूर भी नहीं किया था.

एग्जाम के बाद रिजल्ट आया तो उस के साथसाथ वह भी प्रथम आया था. मौका मिला तो उस ने कहा, ‘मैं जानता हूं कि तुम मुझ से प्यार करती हो. किसी कारण अब तक मुंह से कुछ नहीं कह पाई हो. मगर अब तो स्वीकार कर लो.’ अब वह अपने दिल की बात उस से छिपा न सकी. मोहब्बत का इजहार कर दिया. साथ में यह भी कह दिया, ‘जब तुम्हें नौकरी मिल जाए तो शादी का रिश्ता ले कर मेरे घर आ जाना. तब तक मैं भी कोई न कोई जौब ढूंढ़ लूंगी.’’

अमरेश उस की बात से सहमत हो गया. एक वर्ष तक उन की मुलाकात न हो सकी. कई बार फोन पर बात हुई. हर बार उस ने यही कहा, ‘मिताली, अभी नौकरी नहीं मिली है. जल्दी मिल जाएगी. तब तक तुम्हें मेरा इंतजार करना ही होगा.’

एक दिन अचानक फोन पर उस ने बताया कि उसे कोलकाता में बहुत बड़ी कंपनी में जौब मिल गई है. उसे जौब मिल गई थी. मिताली को नहीं मिली थी. उस ने कहा, ‘जब तक मुझे जौब नहीं मिलेगी, शादी नहीं करूंगी.’ अमरेश ने उस की एक नहीं सुनी, कहा, ‘तुम्हें नौकरी की जरूरत क्या है? मुझ पर भरोसा रखो. तुम मेरे घर और दिल में रानी की तरह राज करोगी.’

वह अमरेश को अथाह प्यार करती थी. उस पर भरोसा करना ही पड़ा. जौब करने का इरादा छोड़ कर उस से शादी कर ली. अमरेश के परिवार में मातापिता के अलावा एक बहन और 2 भाई थे. विवाह के बाद अमरेश उसे कोलकाता ले आया. पार्कस्ट्रीट में उस ने किराए पर छोटा सा फ्लैट ले रखा था.

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अमरेश उसे बहुत प्यार करता था. उस की छोटीछोटी जरूरत पर भी ध्यान देता था. छुट्टियों में किचन में उस का सहयोग भी करता था. प्यार करने वाला पति पा कर मिताली जिंदगी से नाज कर उठी थी. 3 वर्ष कैसे बीत गए, पता भी नहीं चला. इस बीच वह एक बेटे की मां भी बन गई. दोनों ने उस का नाम सुमित रखा था.

मिताली एक बच्चे की मां थी. बावजूद इस के उस का प्यार पहले जैसा अटल और गहरा था. अमरेश उसे टूट कर चाहता था, ठीक उसी तरह जिस तरह वह उसे बेहिसाब प्यार करती थी. सपने में भी उस से अलग होने की कल्पना नहीं करती थी. वह सोया हो या जाग रहा हो, हमेशा उस के चेहरे को देखा करती थी. मोहब्बत से भरपूर एक सुंदर चेहरा. उसी चेहरे में उसे अपना भविष्य नजर आता था. यह दुनिया नजर आती थी. बच्चे नजर आते थे. हर तरफ खुशी नजर आती थी.

3 वर्षों बाद अमरेश से कुछ दिनों के लिए अलग होने की बात हुई तो उस का दिल बैठ सा गया. यह सोच कर वह चिंता में पड़ गई कि उस के बिना कैसे रहेगी? हुआ यों कि एक दिन अमरेश ने औफिस से आते ही कहा, ‘आज मेरा सपना पूरा हो गया.’

‘कौन सा सपना?’

‘दुबई जा कर ढेर सारा रुपया कमाना चाहता था. इस के लिए 2 साल से प्रयास कर रहा था. आज सफल हो गया. वहां एक बहुत बड़ी कंपनी में जौब मिल गई है. 10 दिनों बाद चला जाऊंगा. कुछ महीने के बाद तुम्हें तथा सुमित को भी वहां बुला लूंगा.’

जहां इस बात की खुशी हुई कि अमरेश का सपना पूरा होने जा रहा था, वहीं उस से अलग रहने की कल्पना से दुखी हो गई थी मिताली. शादी के बाद कभी भी वह उस से अलग नहीं हुई थी. दुबई जाने से रोक नहीं सकती थी, क्योंकि वहां जा कर ढेर सारा रुपया कमाना उस का सपना था. सो, उस ने अपने दिल को समझा लिया.

दुबई से अमरेश रोज फोन करता था. कहता था कि उस के और सुमित के बिना उस का मन नहीं लग रहा है. जल्दी ही उन दोनों को बुला लेगा. कोलकाता में उसे 20 हजार रुपए मिलते थे, दुबई से वह 50 हजार रुपए भेजने लगा.

अपने समय पर मिताली पहले से अधिक इतराने लगी थी. उसे अमरेश के हाथों में अपना और सुमित का भविष्य सुरक्षित नजर आ रहा था. एक वर्ष बीत गया. इस बीच अमरेश ने उन्हें दुबई नहीं बुलाया. बराबर कोई न कोई बहाना बना कर टाल दिया करता था.

एक दिन अचानक कोलकाता आ कर सरप्राइज दिया. बताया कि 15 दिन की छुट्टी पर वह इंडिया आया है.

उस ने कहा, ‘अब तक दुबई इसलिए नहीं बुलाया कि वहां अकेले रहना पड़ता. बात यह है कि कंपनी के काम से मुझे बराबर एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता है. कभीकभी तो घर पर 2 महीने बाद लौटता हूं.

‘ऐसे में अकेली औरत देख कर मनचले तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकते थे. मैं चाहता हूं कि सुमित के साथ तुम कोलकाता में ही रहो और अच्छी तरह उस की परवरिश करो.’ वह चुप रही. कुछ भी कहते नहीं बना.

15 दिनों बाद अमरेश दुबई लौट गया. इतने दिनों में ही उस ने पूरे सालभर का प्यार दे दिया था. मिताली उस का अथाह प्यार पा कर गदगद हो गई थी. पार्कस्ट्रीट में ही अमरेश ने उस के नाम फ्लैट खरीद दिया था. अगले 3 वर्षों तक सबकुछ आराम से चला. अमरेश वर्ष में एक बार 10 या 15 दिनों के लिए आता था. उसे अपने प्यार से नहला कर दुबई लौट जाता था.

कालांतर में वह यह चाहने लगी थी कि दुबई की नौकरी छोड़ कर अमरेश कोलकाता में उन के साथ रहे और बिजनैस करे. तीसरे वर्ष अमरेश दुबई से आया तो उस ने उस से अपने दिल की बात कह दी. वह नहीं माना. वह कम से कम 10-15 वर्षों तक वहीं रहना चाहता था.

फिर तो चाह कर भी वह अमरेश को कुछ समझाबुझा नहीं सकी. फायदा कुछ होने वाला नहीं था. उस पर दुबई में अकेले ही रहने का जनून सवार था. उस के दुबई लौट जाने के 2 महीने बाद ही स्वाति का फोन आया था और अब वह मुंबई में थी.

स्वाति की शादी के बाद मोबाइल ठीक करा लिया तो अमरेश का फोन आ गया, ‘‘2 दिनों से परेशान हूं. तुम्हारा मोबाइल स्विचऔफ बता रहा था. बात क्या है?’’

उस ने मुंबई आने की बात अमरेश से छिपा ली. उस से कहा कि एक सहेली की शादी में दिल्ली आई हूं.

2 दिनों बाद लौट जाऊंगी.

अमरेश से हमेशा जिस तरह बात करती थी, उसी तरह से बात की. उसे यह संदेह नहीं होने दिया कि उसे उस की बेवफाई का पता चल गया है. अमरेश ने उस के साथ बेवफाई क्यों की? दुबई में नौकरी करने को बता कर दूसरी शादी कर मुंबई में क्यों रह रहा था? आखिर उस की क्या गलती थी? ये सारी बातें जानने के लिए उसे सारिका से मिलना जरूरी था.

स्वाति ससुराल चली गई थी. उस की मां से बहाना बना कर और सुमित को उन के हवाले कर चौधरी साहब की बिल्डिंग पर दोपहर में गई. उसे अनुमान था कि उस समय अमरेश घर पर नहीं रहता होगा. गार्ड से बात करने पर इस बात की पुष्टि भी हो गई. अमरेश उस समय औफिस में रहता था. गार्ड को उस ने अपना परिचय जर्नलिस्ट के रूप में दिया. कहा, ‘‘अमरेश सर ने सारिका का इंटरव्यू लेने के लिए बुलाया था.’’

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गार्ड ने इंटरकौम द्वारा सारिका से बात की. उस की भी बात करवाई. उस के बाद उसे अंदर जाने की इजाजत मिल गई. अंदर गई तो सारिका ने उस का स्वागत किया. अपना परिचय देते हुए उसे सोफे पर बैठाया. बगैर समय गंवाए उस ने कहा, ‘‘अमरेश सर का कहना है कि उन की जिंदगी में यदि आप नहीं आतीं तो वे ऊंचाई के मुकाम पर नहीं पहुंच पाते. बताइए कि अमरेश सर से आप की शादी कब और कैसे हुई?’’

नौकर कोल्डड्रिंक ले आया. कोल्डड्रिंक पीते हुए जैसेजैसे बातों का सिलसिला आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे अमरेश से शादी करने की जानकारी सारिका देती गई. सारिका अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. मुंबई में ही उस ने ग्रेजुएशन की थी. पिता उस की शादी ऐसे लड़के से करना चाहते थे जो अमीर खानदान से हो और घरजमाई बन कर उन का बिजनैस संभाल सके.

सारिका सांवली थी. नाकनक्श भी अच्छे नहीं थे. कद भी छोटा था. शायद इसीलिए अमीर खानदान का कोई युवक चौधरी साहब का घरजमाई बनने के लिए तैयार नहीं था. गरीब युवकों में से कई सारिका से शादी करना चाहते थे, मगर चौधरी गरीब को पसंद नहीं करते थे. सारिका के ग्रेजुएशन करने के बाद चौधरी साहब ने उस की पढ़ाई छुड़वा दी थी और उस के लिए वर की तलाश शुरू कर दी थी. 3 साल बीत जाने के बाद भी मनपसंद वर नहीं मिला. उस के बाद सारिका की जिंदगी में अचानक अमरेश आ गया. हुआ यों कि सारिका मातापिता के साथ एक रिश्तेदार की शादी में 3 साल पहले कोलकाता गईर् थी. समारोह में अमरेश से उस की मुलाकात हुई थी.

अमरेश जिस कंपनी में काम करता था, उस के मैनेजिंग डायरैक्टर की बेटी की शादी थी. सारे स्टाफ को बुलाया गया था. पार्टी में अमरेश सारिका के आगेपीछे घूमने लगा तो मौका देख कर सारिका ने उस से पूछा, ‘आप मेरे आगेपीछे क्यों घूम रहे हैं, मुझ से चाहते क्या हैं?’

अमरेश ने बगैर किसी संकोच के कह दिया, ‘पहली नजर में ही मुझे आप से प्यार हो गया है. आप से शादी करना चाहता हूं.’

सारिका को अमरेश बड़ा दिलचस्प लगा. उस का व्यक्तित्व उस के दिल को छू गया. मुसकरा कर बोली, ‘आप ने मुझ में ऐसा क्या देखा कि मेरे दीवाने हो गए?’

‘आप बहुत सुंदर हैं. आप की सुंदरता मेरे दिल में उतर गई है. जब तक आप से शादी नहीं होगी, मुझे चैन नहीं मिलेगा.’

‘मैं गोरी नहीं, सांवली हूं, फिर सुंदर कैसे हो सकती हूं. आप झूठ बोल रहे हैं?’

‘मैं सच कह रहा हूं. सांवली होते हुए भी आप इतनी सुंदर हैं कि गोरी से गोरी लड़की भी सुंदरता में आप के सामने घुटने टेक देगी.’

अमरेश से सारिका प्रभावित हो गई. उस से उस की सारी जानकारी लेने के बाद उसे अपना परिचय दिया. फिर कहा, ‘घर जा कर मम्मीपापा से बात करूंगी. पापा तो नहीं चाहेंगे कि किसी गरीब लड़के से मेरी शादी हो. मैं आप से शादी करने की पूरी कोशिश करूंगी. दरअसल, मुझे भी आप से पहली नजर में ही प्यार हो गया है.’

अमरेश ने सारिका को बताया था कि वह कुंआरा है. दुनिया में उस का कोई नहीं है. वह छोटा था, तभी उस के मातापिता का देहांत हो गया था. मामा ने परवरिश की, उन्होंने ही पढ़ायालिखाया. मामा का अचानक देहांत हो गया तो उन के बेटों ने उसे घर से निकाल दिया. ऐसे में उस के एक दोस्त प्रभात ने उसे सहारा दिया. उस की बदौलत ही उसे नौकरी मिली. वह उस के साथ गोल पार्क में रहता है. उस का परिवार गांव में रहता है.

घर जा कर सारिका ने मम्मीपापा को अमरेश के बारे में बताया तो दोनों ने शादी से साफ मना कर दिया. सारिका अमरेश से हर हाल में विवाह करना चाहती थी. इसलिए उस ने घर में बवाल कर दिया. आत्महत्या करने की धमकी दी तो चौधरी साहब को उस की बात मान लेनी पड़ी. कोलकाता जा कर अमरेश से मिलने के 10 दिनों बाद चौधरी साहब ने सारिका की शादी अमरेश से कर दी. अमरेश अच्छा पति साबित हुआ. सारिका को कभी किसी तरह का कष्ट नहीं दिया. चौधरी साहब का बिजनैस भी संभाल लिया. वर्तमान में सारिका

2 महीने से प्रेग्नैंट थी. अमरेश की सचाई जान कर मिताली के दिमाग में जैसे हथौड़े चलने लगे थे. मन में आया कि इसी पल सबकुछ सारिका को बता दे. धोखेबाज अमरेश की कलई खोल कर रख दे. पर ऐसा न कर सकी. जबान तालू से चिपक गई थी. लगा, जैसे ही सारिका को अमरेश की सचाई बताऊंगी उस की जिंदगी में बहार के बाद पतझड़ वाली स्थिति आ जाएगी. न जाने क्यों वह उसे दुख नहीं देना चाहती थी.

वहां रुकना उस के लिए ठीक नहीं था. ‘‘जल्दी ही इंटरव्यू प्रकाशित होगा,’’ कह कर चली आई. तत्काल कोई फैसला लेना आसान नहीं था. अपने साथसाथ सुमित की जिंदगी का भी सवाल था. इसलिए चुपचाप कोलकाता लौट आई. वह प्रभात को जानती थी. वह अमरेश का दोस्त था. अमरेश के साथ उस के घर 3-4 बार जा चुकी थी. अमरेश की उपस्थिति में वह भी कई एक बार घर आ चुका था. कोलकाता में जिस कंपनी में अमरेश जौब करता था, प्रभात भी उसी कंपनी में था.

अमरेश से शादी किए हुए एक वर्ष हुआ था तब की बात है, एक दिन बातोंबातों में प्रभात ने बताया था, ‘अमरेश आप को बहुत प्यार करता है. इसीलिए उस ने आप से शादी की, नहीं तो वह अपनी ख्वाहिश पूरी करता.’

‘कैसी ख्वाहिश?’ उत्सुकतावश पूछ लिया था मैं ने.

‘वह ऐशोआराम की जिंदगी चाहता था. बेहिसाब धनदौलत का मालिक बनना चाहता था. इस के लिए वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार था. मौका नहीं मिला तो 20 हजार रुपए महीने की नौकरी कर आप से शादी कर ली.

‘आप से शादी करने के बाद भी उस ने हिम्मत नहीं हारी है. वह हर हाल में अथाह दौलत का मालिक बनना चाहता है. इसलिए अब भी मौके की तलाश कर रहा है. जिस दिन मौका उस के हाथ आएगा, अंजाम की परवा किए बिना अवसर को हथिया लेगा.’

प्रभात ने जिस अवसर की बात की थी, उस समय समझ नहीं पाई थी. अब सबकुछ समझ गई थी. वह किसी अमीर लड़की से शादी कर अपनी ख्वाहिश पूरी करना चाहता था. मामला शायद ऐसा था, कोलकाता की पार्टी में अमरेश को किसी सोर्स से सारिका की जानकारी मिली होगी. उस के बाद अपनी मंजिल पाने के लिए चिकनीचुपड़ी बातों से सारिका का दिल जीत कर उस से शादी की और मिताली से दुबई जाने की बात कह कर वह सारिका के साथ रहने लगा था.

इस में कोई शक नहीं था कि उस के प्रति अमरेश का प्यार मात्र छलावा था. मिताली दोराहे पर थी. फैसला लेना आसान नहीं था. तलाक लेने की स्थिति में उस की जिंदगी में तो बदलाव आता ही, सुमित की जिंदगी भी एकदम से बदल जाती. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे, क्या न करे. इसी उधेड़बुन में कई दिन गुजर गए. इस बीच फोन पर अमरेश से बिलकुल सामान्य तरीके से बात की. उसे किसी तरह का संदेह नहीं होने दिया. 10 दिनों बाद की बात है. एक दिन शाम के 6 बजे सुमित को पढ़ा रही थी कि डोरबैल बज उठी. जा कर दरवाजा खोला, तो अमरेश था. वह जब भी आता था बगैर सूचना दिए ही आता था. 10-15 दिनों के लिए मुंबई से बाहर जाने के लिए उसे सारिका से कुछ अच्छा बहाना भी तो बनाना पड़ता होगा. सटीक बहाने के लिए उसे समय की प्रतीक्षा करनी होती होगी. इसीलिए आने की पूर्व सूचना नहीं दे पाता होगा.

अमरेश को किसी तरह का शक न हो, इसलिए सदैव की तरह वह उस से लिपट गई और उस का स्वागत किया. फिर उसे अंदर ले गई. आवाज सुन कर सुमित भी दौड़ कर आ गया. अमरेश के चेहरे पर सदैव की तरह खुशनुमा भाव था. जरा भी नहीं लगा कि वह दोहरी जिंदगी जी रहा है. हर बार की तरह इस बार भी उस ने मिताली पर अपना प्यार बरसाने में कोई कमी नहीं की. उस के मन में कई बार आया कि उस की बेवफाई का राज खोल दे. कह दे कि प्यार का नाटक बंद कर दो. पर कह नहीं  सकी. 10 दिनों बाद वह चला गया. प्रति महीना 50 हजार रुपए तो भेजता ही था. इस बार जाते समय उस ने 5 लाख रुपए यह कह कर दिए कि अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना और सुमित की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देना.

सदा अन्याय का मुकाबला करो, अपने हक के लिए सदा लड़ो, समाज में पनपती बुराइयों पर अंकुश लगाओ. यह सब स्कूल और कालेज में पढ़ाया गया था. मिताली ने सीखा भी था. पर जिंदगी की पाठशाला में तो कुछ और ही देखने को मिल रहा था. अमरेश के प्रति जबान खोलती तो कई जिंदगियां बरबाद हो जातीं.  मातापिता का कोई सहारा न था क्योंकि उन्होंने एक तरह से साफ कह दिया, अपनी जिंदगी खुद भुगतो.

इसलिए अमरेश के जाने के बाद उस ने फैसला किया कि जब तक उस का अभिनय सफलतापूर्वक चलता रहेगा, तब तक चुपचाप सहती रहेगी, ठीक उसी तरह जिस तरह उस की जैसी हजारों महिलाएं चुपचाप सहती रहती हैं. क्या उस का फैसला सही था? अगर वह हल्ला मचाती तो सारिका भी टूटती, सुमित भी टूटता, अमरेश भी बेकार होता और वह खुद अदालतों के चक्करों में पिस जाती. सारिका या वह कौन असली पत्नी है, कानूनी है, यह तो अभी नहीं पता, पर इस बोझ को ले कर चलना ही ठीक है.

ऐसा भी होता है दिसंबर की छुट्टियों में हम ने घूमने का प्रोग्राम बनाया. बच्चों की भी छुट्टियां थीं सो, दार्जिलिंग जाने का प्रोग्राम बन गया. दिल्ली से सिलीगुड़ी की सीधी ट्रेन थी. हमारी आरक्षित सीट थी एसी कोच में. यह आराम था क्योंकि लंबी दूरी का सफर था. दूसरे दिन रास्ते में पटना स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो कुछ ठेलेवाले दहीबड़े की दोना प्लेट ले कर आए और ‘10 के 2, 10 के 2,’ चिल्लाते हुए बेचने लगे. एक दोना प्लेट में 2 बड़े व उस में दहीचटनी आदि मसाला डाल रखा था, देखने में अच्छे भी लग रहे थे और हम लोगों का भी मन हुआ कि खा कर देखा जाए. दहीबड़े स्वाद में भी ठीक थे.

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हम लोग 5 थे. सो उस को हिसाब कर 25 रुपए दिए तो बोला, ‘‘50 रुपए दीजिए. हम ने उस से कहा, ‘‘अभी तो तुम चिल्ला कर बोल रहे थे 10 के 2 बड़े.’’ तो वह बोला, ‘‘ठीक ही बोला, देखिए प्लेट में 2 बड़े ही हैं.’’ दरअसल एक पलेट में 2 बड़ों का बोल रहा था. हम ने सोचा कि 2 प्लेट का बोल रहा है. इस से मुझे और मेरी बेटी को तो खासी परेशानी नहीं हुई लेकिन मेरे दामाद थोड़े चिढ़ गए. फिर भी हम ने उसे 50 रुपए दिए. मैं और मेरी बेटी हंसी नहीं रोक पाए, तो दामाद बोले, ‘‘इस में हंसने की क्या बात है?’’ हम ने हंसते हुए कहा, ‘‘ऐसा ही होता है.’’  काशी चौहान

मेरे पति गोंडा से मनकापुर आने के लिए पैसेंजर ट्रेन पर चढ़े. आगे की सीट पर कुछ महिलाएं लेटी हुई थीं. उन्होंने एक महिला से कहा, ‘‘मैडमजी, उठ कर बैठ जाइए तो मैं भी बैठ लूं.’’ वह महिला उठ कर बैठ गई.

उस महिला के साथ एक बुजुर्ग महिला भी थीं. वे जोरजोर से बोलने लगीं, ‘‘ये देखो, ये मेरी बहू को मैडमजी बोल रहे हैं, बहनजी कह सकते थे, माताजी कह सकते थे.’’

मेरे पति दुविधा में थे कि मैं ने ऐसा क्या कह दिया कि ये चिल्ला रही हैं. पास बैठे लोग यह सब देख रहे थे. उन में से एक व्यक्ति आया और उस बुजुर्ग महिला से बोला, ‘‘माताजी, मैडम का अर्थ क्या होता है?’’ इस पर वे महिला बोलीं, ‘‘मैडम माने, मेहरारू होत है.’’ तब, उन्हें मैडम का अर्थ बताया गया, तो वे शांत हुईं.

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