लेखक: नरेंद्र कुमर टंडन 

भाग 1

‘‘आप हैं मिस वैभवी, सीनियर मार्केटिंग मैनेजर,’’ शाखा प्रबंधक ने वैभवी का परिचय नए नियुक्त हुए सेल्स एवं डिस्ट्रिब्यूशन औफिसर विनोद से कराते हुए कहा.

वैभवी ने तपाक से उठ कर हाथ मिलाया. विनोद ने वैभवी के हाथ के स्पर्श में गर्मजोशी को स्पष्ट महसूस किया. उस ने वैभवी की तरफ गौर से देखा. वह उस के चुस्त शरीर, संतुलित पोशाक और दमकते चेहरे पर बिखरी मधुर मुसकान से प्रभावित हुआ.

वैभवी ने भी विनोद का अवलोकन किया. सूट के साथ मैच करती शर्ट और नेक टाई, अच्छी तरह सैट किए बाल, क्लीनशेव्ड, दमकता चेहरा पहली नजर में प्रभावित करने वाला व्यक्तित्व.

‘‘आप हैं मिस्टर विनोद, आवर न्यू सेल्य एंड डिस्ट्रिब्यूशन मैनेजर.’’

वैभवी से परिचय के बाद शाखा प्रबंधक महोदय विनोद को सिलसिलेवार सभी केबिनों में ले गए. विनोद ने केबिन में अपनी सीट पर बैठ कर मेज के एक तरफ रखा लैपटौप औन किया.

थोड़े समय में ही सेल्स, डिस्ट्रिब्यूशन और मार्केटिंग इंटररिलेटिड वैभवी और विनोद की नियमित बैठकें होने लगीं. फिर धीरेधीरे अंतरंगता बढ़ती गई.

दोनों ही अविवाहित थे. दोनों अपने लिए उपयुक्त जीवनसाथी की तलाश में भी थे. बढ़ती अंतरंगता की परिणति उन की मंगनी में बदली और विवाह की तिथि तय की गई.

दोनों के परिवार जोशोखरोश से विवाह की तैयारियां कर रहे थे. एक रोज बड़े डिपार्टमैंटल स्टोर से शौपिंग कर वैभवी बाहर आ रही थी, सामने से आती एक प्रौढ़ा स्त्री उस से टकराई. उस के हाथों का पैकेट वैभवी के वक्षस्थल से टकराया.

दर्द की तीव्र लहर वैभवी के वक्ष स्थल पर फैल गई. बड़ी मुश्किल से चीखने से रोक पाई वैभवी अपनेआप  को. पर लौट कर कपड़े बदलते हुए उस ने वक्षस्थल पर हाथ फिराया तो एक हलकी सी गांठ उस को दाएं वक्षस्थल पर महसूस हुई. गांठ दबाने पर हलकाहलका दर्द उठा.

औफिस से थोड़ी देर की छुट्टी ले कर वह अपने परिचित डाक्टर के पास गई. जांच करने के बाद डाक्टर गंभीर हो गए.

‘‘आप को कुछ टैस्ट करवाने होंगे,’’ डाक्टर साहब ने गंभीरता से कहा.

‘‘क्या कुछ सीरियस है?’’ आशंकित स्वर में वैभवी ने पूछा.

‘‘टैस्ट रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है. वैसे क्या आप के परिवार में किसी, मेरा मतलब आप की माताजी या पिताजी या दादीनानी को ऐसी तकलीफ हुई थी,’’ डाक्टर साहब ने धीरेधीरे बोलते हुए गंभीर स्वर में पूछा.

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इस सवाल पर वैभवी गंभीर हो गई. उस की मम्मी को कई साल पहले, जब वह किशोरावस्था में थीं, ब्रेस्ट कैंसर हुआ था. लंबे समय तक तरहतरह के इलाज के बाद और वक्षस्थल से एक वक्ष काटने के बाद इस समस्या से छुटकारा मिला था. क्या उसे भी वक्षस्थल यानी ब्रेस्ट कैंसर है?

‘‘क्या टैस्ट आप के यहां होंगे?’’

‘‘जी नहीं, ये सब बड़े अस्पताल में होते हैं. एक टैस्ट से स्थिति स्पष्ट न होने पर दूसरे कई टैस्ट करवाने पड़ सकते हैं.’’

‘‘बाई द वे, आप का अंदाजा क्या है?’’ वैभवी के इस सवाल पर डाक्टर गंभीर हो गए, ‘‘मिस वैभवी, अंदाजे के आधार पर चिकित्सा नहीं हो सकती. प्रौपर डायग्नोसिस किए बिना बीमारी का इलाज नहीं हो सकता.’’

‘‘आप ने फैमिली बैकग्राउंड पर सवाल किया था. मेरी मम्मी को कई साल पहले ब्रेस्ट कैंसर हुआ था. सर्जरी द्वारा उन के वक्ष को काटना पड़ा था. कहीं मु झे भी…’’

‘‘मिस वैभवी, हैव फेथ औन योरसैल्फ. कभीकभी सारा अंदाजाअनुमान गलत साबित होता है,’’ यह कहते डाक्टर साहब ने अपने लैटर पर एक बड़े अस्पताल का नाम लिखते उस पर परामर्श लिखा और कागज वैभवी की तरफ बढ़ा दिया.

औफिस में अपनी सीट पर बैठी वैभवी गंभीर सोच में थी. हर रोज वह अपने सहयोगियों के साथ कंपनी के किसी नए उत्पादन और उस की मार्केटिंग पर डिस्कशन करती थी, मगर आज वह खामोश थी.

विनोद भी अपनी मंगेतर को गंभीर देख कर उल झन में था.

‘‘हैलो वैभवी, हाऊ आर यू?’’ साइलैंट मोड पर रखे सैलफोन की स्क्रीन पर एसएमएस चमका.

‘‘फाइन,’’ संक्षिप्त सा जवाब दे वैभवी ने फोन बंद कर दिया और उठ कर शाखा प्रबंधक के कमरे में चली गई.

‘‘सर, मु झे कुछ पर्सनल काम है, आज छुट्टी चाहिए.’’

बेटी को आज इतनी जल्दी आया देख कर मम्मी चौंक गईं. ‘‘वैभवी, कोई प्रौब्लम है?’’ पानी का गिलास थमाते मम्मी ने पूछा.

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वैभवी खामोश थी. क्या बताए? कैंसर एक दाग सम झा जाता था. एक स्टिगमा. कैंसरग्रस्त व्यक्ति को अछूत के समान सम झ कर हर कोई उस से दूरी बनाए रखना चाहता है.

उस की मम्मी को भी कैंसर हुआ था 20 साल पहले. सर्जरी द्वारा उन का एक वक्ष काट दिया गया था. कैंसर जेनेटिक स्टेज की प्रथम स्टेज पर था. उस का फैलना थम गया था. 20 साल बाद उस की मम्मी नौर्मल लाइफ जी रही थीं. मगर सब जानकार, सभी संबंधी उन से एक दूरी बना कर रखते थे.

‘‘वैभवी, क्या बात है, कोई औफिस प्रौब्लम है?’’ सोफे पर बैठ कर वैभवी का चेहरा अपने हाथों में थामते मम्मी ने प्यार से पूछा.

वैभवी की आंखें भर आईं. वह हौलेहौले सुबकने लगी. इस पर मम्मी घबरा गईं. उन्होंने उस को अपनी बांहों में भर लिया. पानी का गिलास उस के होंठों से लगाया. चंद घूंट पीने के बाद वैभवी संयत हुई. उस ने स्थिर हो मम्मी को सब बताया.

वैभवी की मां गंभीर हो गईं. क्या कैंसर पुश्तैनी था? उन को कैंसर था. उन से पहले शायद उन की मां को भी. मगर दोनों अच्छी उम्र तक जीवित रही थीं.

अजीब पसोपेशभरी और दुखभरी स्थिति बन गई थी. वैभवी के विवाह होने को मात्र 15 दिन बाकी थे. अब यह दुखद स्थिति बताने पर रिश्ता टूटना तो था ही, साथ ही कैंसरग्रस्त परिवार है, यह दाग स्थायीतौर पर उन पर लग जाना था.

‘‘डाक्टर ने अभी अपना अंदाजा बताया है, साथ ही यह भी कहा है कि कई बार अंदाजा गलत भी साबित होता है,’’ मम्मी ने हौसला बंधाने के लिए आश्वासनभरे स्वर में कहा.

‘‘मगर हम विनोद और उस के परिवार को क्या बताएं?’’

वैभवी के इस सवाल पर मम्मी खामोश हो गईं. मां के बाद अब बेटी को कैंसर जैसे रोग की त्रासदी का सामना करना पड़ रहा था. मां को कैंसर विवाह के बाद 2 बच्चों को जन्म देने के बाद जाहिर हुआ था. परिणाम में वक्ष स्थल और बाद में गर्भाशय को निकालना पड़ा था.

मगर बेटी की त्रासदी मां से बड़ी थी. वह कुंआरी थी. विवाह दहलीज पर था. वरवधू दोनों पक्षों की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं.

विवाह की तारीख से पहले रिश्ता टूट जाना आजकल के जमाने में इतना असामान्य नहीं सम झा जाता. मगर कोई उचित कारण होना चाहिए.

मगर वैभवी की स्थिति एकदम असामान्य थी. कुदरत की मार कि इतनी त्रासदीभरे ढंग से उस पर पड़ी थी. ‘‘मैं अगर यह बात विनोद से छिपाती हूं तो विवाह के बाद इस बात के उजागर होने पर, कि मु झे डाक्टर द्वारा आगाह कर दिया गया था, मैं सारी उम्र उन से आंख नहीं मिला सकूंगी,’’ वैभवी ने सारी स्थिति की समीक्षा करते कहा.

‘‘मेरे बाद तुम्हारे कैंसरग्रस्त होने से तुम्हारी छोटी बहन अनुष्का के भविष्य पर भी प्रभाव पड़ेगा. उस का रिश्ता करना मुश्किल हो जाएगा,’’ मम्मी के स्वर में परेशानी  झलक रही थी.

वैभवी भी सोच में थी कि वह विनोद को कैसे बताए.

‘‘वैभ,’’ विनोद का फोन था. हर शाम विदा लेने के बाद दोनों एक या अनेक बार अपनेअपने सैलफोन से हलकीफुलकी चैट करते थे.

‘‘हैलो विनोद, हाऊ आर यू?’’ प्रत्युत्तर में वैभवी का औपचारिकताभरा संबोधन सुन कर विनोद चौंका. उस ने गौर से सैलफोन की स्क्रीन पर नजर डाली, कहीं गलती से किसी और का नंबर तो प्रैस नहीं कर दिया था. प्यार से विक्की कह कर बुलाने वाली वैभवी उसे अपरिचित या गैर के समान संबोधन कर रही थी.

‘‘विनोद, परसों संडे है, आप पार्क व्यू होटल के ओपन रैस्टोरैंट में आ जाना,’’ कहते हुए वैभवी ने फोन काट दिया.

असमंजस में पड़ा विनोद हाथ में पकड़े सैलफोन को देख रहा था.

पार्क व्यू होटल के रैस्टौंरैंट को एक बड़े तालाब को सुधार कर पिकनिक स्पौट का रूप दिया गया था. कई बार दोनों वहां जा चुके थे.

आमनेसामने बैठ कर चप्पू चलाते किश्ती  झील के बीचोंबीच ला कर किश्ती रोक कर विनोद ने गंभीर स्वर में पूछा, ‘‘क्या बात है? इतनी सीरियस क्यों हो? तुम्हारा लहजा भी एकदम एब्नौर्मल है?’’

वैभवी ने अपने छोटे वैनिटी पर्स से एक लिफाफा निकाल कर बढ़ाया. एक बड़े अस्पताल का लिफाफा देख कर विनोद चौंका.

उस ने लिफाफा निकाला और उस में रखे कागजों को निकाल कर एक नजर डाली और प्रश्नवाचक नजरों से वैभवी की तरफ देखा.

‘‘विनोद, मु झे कैंसर है. मेरे वक्षस्थल में ट्यूमर है. मैं ब्रेस्ट कैंसर ग्रस्त हूं. आई एम सौरी,’’ कहते हुए वैभवी ने अपना चेहरा  झुका लिया.

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विनोद को ऐसा लगा जैसे किसी ने उस को ऊंची पहाड़ी के शिखर से नीचे की ओर की धक्का दे दिया हो.

वह भौचक्का सा कभी हाथ में पकड़े मैडिकल रिपोर्ट के कागजों को, कभी सामने बैठी अपनी मंगेतर, अपनी भावी पत्नी को देख रहा था. उस ने एक बार फिर सरसरी नजर मैडिकल रिपोर्ट पर डाली और कागज लिफाफे में डाल कर लिफाफा वैभवी की तरफ बढ़ा दिया. दोनों खामोश थे.

क्रमश:

अगले हफ्ते पढ़ें कहानी का दूसरा भाग

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