दिल्ली कांग्रेस के नए अध्यक्ष और पूर्व कोषाध्यक्ष सुभाष चोपड़ा के सामने चुनौती आम आदमी पार्टी या भाजपा से निबटने के लिए रणनीति बनाने, संगठन को मजबूती देने या दिल्ली में कांग्रेस की खोई साख हासिल करने की कम, पार्टी दफ्तर राजीव भवन में रोशनी का इंतजाम करने की ज्यादा है.

दिल्ली कांग्रेस की कंगाली और बदहाली का आलम यह है कि उस के पास बिजली का 2 लाख रुपए का बिल भरने के लिए भी पैसा नहीं है. इस जले पर नमक छिड़कने के लिए बिजली कंपनी डिस्काम वाले हर कभी कनैक्शन काट देते हैं जिसे मुद्दत से आधी पगार पर काम कर रहा मौजूदा डेढ़ दर्जन कर्मचारियों का स्टाफ झुग्गीझोंपड़ी वालों की तरह जुगाड़तुगाड़ कर काम चला लेता है. हालांकि, सुभाष चोपड़ा चाहें तो खुद यह रकम अदा कर सकते हैं. बहरहाल, दिल्ली में कांग्रेस तभी रोशन होगी जब कांग्रेस 70 में से कम से कम 20 सीटें विधानसभा में ले आए.

ये भी पढ़ें- हक के बदले लाठी, सीएम योगी का ये कैसा न्याय

भरत मिलाप के माने

अपने बुद्धिमान और भूतपूर्व शक्तिशाली मित्रनुमा शत्रुओं से खुद उन के यहां मिलने जाने का वैदिककालीन रिवाज उत्तर प्रदेश के महंत मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी निभाया और दीवाली के बहाने सपा संस्थापक मुलायम सिंह से मिल कर अटकलों का बाजार गरमा दिया. मुलायम सिंह की हालत इन दिनों वैसी ही है जैसी डाक्टर बिरादरी में दंत चिकित्सकों की होती है कि कोई मरीज आ गया तो बल्लेबल्ले, वरना कालेज के जमाने की सहपाठिनों की मधुर स्मृतियों या मोबाइल पर वांछितअवांछित वीडियो देख वक्त काटते रहो.

लगाने वालों ने अंदाजा लगा लिया कि हो न हो, इस मुलाकात का संबंध जरूर अयोध्या और राम से ही है क्योंकि सर्दी के मौसम में यह मुद्दा गरम ही रहता है. रामदूत अतुलित बलधामा को साक्षात अपने भवन में आया देख गदगद मुलायम ने कहीं हिंदुत्व की भावुकता में आ कर  अपने कवचकुंडल के दान का वचन तो नहीं दे दिया, यह तो वही जानें, लेकिन यह बात ज्यादा अहम है कि अयोध्या के मद्देनजर हमेशा की तरह अभी भी भगवा खेमे को पिछड़ों की जरूरत ज्यादा है, दलितों की होती तो योगी, मायावती के महल में जाते.

Bharat-milap-ke-mane

भूपेश का ड्रामा

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दीवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा पर दुर्ग जिले में अपने हाथ पर सौंटा, जिस का वर्तमान नाम कोड़ा है, सार्वजनिक रूप से खाया ताकि राज्य में खुशहाली रहे और उन के अपने पाप या कष्ट कटें.

धर्म के नाम पर खुद को कष्ट देने का रिवाज नया नहीं है. लेकिन अगर इस से खुशहाली आती हो तो सभी मुख्यमंत्रियों को रोजरोज खुद को इस सौंटे से पिटवाना चाहिए. सभी मंत्रियों, अधिकारियों और कर्मचारियों को भी कार्यालयीन समय में सौंटे से पीटा जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए जिस से खुशहाली आए. सौंटा खाते हुए वीडियो दिखा कर जनता को निरुत्तर किया जा सकता है.

अब कौन भूपेश बघेल को समझाए कि 15 वर्षों बाद कांग्रेस को जनता की सेवा करने का मौका मिला है तो उसे बेहूदे पाखंडों में वे जाया न करें, जिन के चलते भाजपा चलता हुई है.

ये भी पढ़ें- महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन,  शिवसेना पहुंची सुप्रीम कोर्ट

फिर बन गए…

आजादी के सालों बाद तक पंचायतों में सरपंच का चुनाव बड़े सौहार्दपूर्ण माहौल में हुआ करता था. गांव के 20-30 लोग पेड़ के नीचे बैठ कर किसी दबंग, रसूखदार के नाम पर हाथ ऊपर उठा देते थे और मिनटों में आसपास के गांवों में बिना किसी मीडिया या सोशल मीडिया के सहारे खबर पहुंच जाती थी कि इस बार फलां ठाकुर साहब या नंबरदार ने सरपंच बनने की अनुकंपा की है.

दूसरे क्षेत्रीय दलों की तरह जनता दल (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव भी इसी प्रचलित पद्धति से संपन्न हुआ. नीतीश कुमार फिर सर्वसम्मति से दिल्ली के मावलंकर हाल में साल 2022 तक के लिए इस अहम पद की जिम्मेदारी लेने को बिना किसी मानमनौव्वल के मान गए. बिहार में 2020 में विधानसभा चुनाव होने हैं और हालिया विधानसभा  उपचुनाव में उन की पार्टी जैसेतैसे 5 में से केवल एक ही सीट जीत पाई है. देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रवाद और सत्ता विरोधी आंधी को नीतीश कैसे रोक पाएंगे.

Tags:
COMMENT