अयोध्या के राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब संतो में ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में शामिल होने की होड़ लग गई है. अयोध्या के संत ही नहीं विश्व हिन्दू परिषद और राम जन्मभूमि न्यास भी चाहता है कि राममंदिर बनाने के लिये गठित होने वाले सरकारी ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में उनका प्रभाव बना रहे. ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में शामिल होने के लिये संतों के कई गुट बन गये हैं. इनमें से एक गुट का कहना है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाया जाएगा. वह मुख्यमंत्री के रूप में नहीं गोरक्षापीठ के मंहत के रूप में ट्रस्ट में शामिल हो. योगी आदित्यनाथ का पक्ष लेने वाले अयोध्या के राम मंदिर के संघर्ष में गोरक्षापीठ के महत्व को बताते हैं. गोरखपुर की गोरक्षा पीठ राममंदिर निर्माण के संघर्ष में 1949 से सक्रिय है. इस पीठ के मंहत दिग्वविजय नाथ, मंहत अवैद्य नाथ भी राम मंदिर निर्माण में संघर्ष करते रहे है.

राममंदिर बनाने के लिये आन्दोलन करने से पहले ही विश्वहिन्दू परिषद ने रामजन्मभूमि न्यास का गठन किया था. राममंदिर निर्माण की जिम्मेदारी रामजन्मभूमि न्यास की थी. ऐसे में रामजन्मभूमि न्यास चाहता है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में उसकी हिस्सेदारी सबसे अधिक हो. राम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिन्दू परिषद राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के करीबी संगठन है. संघ का जिस तरह से केन्द्र सरकार पर प्रभाव है उसको देखते हुए यह साफ है कि राममंदिर के लिये बनने वाले ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में विश्व हिन्दू परिषद और रामजन्मभूमि न्यास की हिस्सेदारी सबसे अधिक होगी. अयोध्या में संतों की एक ऐसी लौबी भी है जो विश्वहिन्दू परिषद और रामजन्मभूमि न्यास की विरोधी है. संतों की यह लौबी चाहती है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में विश्व हिन्दू परिषद और रामजन्मभूमि न्यास की भूमिका सीमित ही रहे. परेशानी की बात यह है कि यह खुलकर इसका विरोध नहीं कर सकते. अयोध्या के इन संतो को लगता है कि अगर सरकार का विरोध करेंगे तो सरकार उनको ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में जगह नहीं देगी.

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‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में शामिल होने की खींचतान का कारण राममंदिर से होने वाली कमाई है. जो संत इस बोर्ड में शामिल नहीं हुआ उसके अयोध्या का प्रभावशाली संत नहीं माना जायेगा. विश्वहिन्दू परिषद का मानना है कि रामजन्मभूमि न्यास में ही कुछ बदलाव करके सरकारी ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ बना दिया जाए. विहिप इसके लिये अपने पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंघल की सोच भी बताने लगी है. अशोक सिंघल नहीं चाहते थे कि ऐसे किसी बोर्ड में सरकारी हस्तक्षेप हो. विहिप का विरोध करने वाले दूसरे संत चाहते है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ के बनाने में सरकार का अधिकार पूरा हो. नाम ना छापने की शर्त पर अयोध्या के एक संत कहते है कि विहिप अब चाहती है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ पर उसका पूरा अधिकार हो. जिससे आने वाले समय में केन्द्र और प्रदेश सरकार भाजपा के खिलाफ आ जाए तो भी रामंदिर पर विहिप का अधिकार बना रहे.

राम मंदिर बनाने वाला ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ सबसे बड़ी संस्था होगी. इसमें करोड़ो रूपए आएंगे. अयोध्या में संत चाहते हैं कि इसमें उनकी हिस्सेदारी बनी रहे. महंत धर्मदास चाहते हैं कि राम की पूजा का अधिकार उनको मिले. तपस्वी छावनी के उत्तराधिकारी महंत परमहंस दास का विवाद चर्चा में है. वह कहते है कि जब तक उनको सुरक्षा नहीं मिलेगी वह वापस अयोध्या नहीं आएंगे. ऐसे में साफ है कि राममंदिर बनाने के लिये गठित होने वाले ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ को बनाना सरल नहीं है. बोर्ड में सरकार का हस्तक्षेप संघ भी नहीं चाहता है. उसे खतरा है कि सरकार बदलने के साथ उसका प्रभाव खत्म हो सकता है. अगर विश्वहिंदू परिषद या रामजन्मभूमि न्यास का प्रभाव ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ पर रहेगा तो भाजपा की सरकार जाने के बाद भी संघ का प्रभाव बना रहेगा.

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